दम तोड़ती बासं से टोकनी बनाने की कला
40 परिवार की जीविका चलती थी इसी काम से वर्तमान में बांस नहीं मिलने से इन परिवारों की आर्थिक स्थिति खराब है

सुनिल योगी
बागली। बागली मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत गुवाड़ी में मूल बस्ती के रूप में रहने वाले 40 से अधिक परिवार झम राल(अनुसूचित जाति) जाति में आते हैं।यह लोग खेती हर काम बहुत कम जानते हैं। लेकिन बांस से निर्मित हर प्रकार की कलाकारी यह कर लेते हैं जिसमें टोकनी सूपडे डाल ओर टाटी एवं अनाज रखने की कोठी दीवार की जगह बस की टाटी आदि के साथ बांस से बनने वाली मकान की छत आदि आसानी से बनाते रहे 1992 तक क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में बांस उत्पादन होता था। जंगलों से यह परिवार बस लेकर आते और घर पर दिनभर बैठकर बड़े टोपले बनाते थे उस वक्त यह प्रत्येक घर में जिनके घर मवेशी है ,काम में लिए जाते थे चाहे अनाज रखने हो या गोबर फेंकना हो या मवेशियों को घास फुस डालना कुए खुदाई की मिट्टी निकालना हो इसका उपयोग बना हुआ था। लेकिन वन संरक्षण के चलते धीरे-धीरे इनका यह काम कम होता गया नई पीढ़ी रोजगार की तलाश में अन्यत्र चली गई दलाल लोगों के भरोसे या अपना सामान बेचते लेकिन उचित लाभ नहीं मिलता ।वर्तमान में 18 से अधिक परिवार इस स्थान पर है ।जो आज भी यह कार्य कर रहे हैं। जंगल में बांस नहीं है फिर भी जिन किसानों ने बस के पौधे लगाए हैं उनसे यह खरीद कर टोकनी सुपडी बनाते हैं। विवाह समारोह में भी छोटी टोकनी और अन्य सामग्री बात से निर्मित लगती है इसका निर्माण भी करते हैं। एक समय आया था 1998 का जब इस परिवार से एक व्यक्ति मोटला भाई इस गांव सरपंच बना लेकिन उस वक्त सरपंच पावर उस मालूम नहीं था। वह समाज के लिए कुछ भी नहीं कर पाया आज इनकी कला धीरे-धीरे सीसक सीसक कर दम तोड़ रही है। जिसे संरक्षण की आवश्यकता है। इन परिवारों के पास खेती वाली भूमि तक नहीं है। और लोग भी बस के उपयोग वाली वस्तुओं से दूर होते जा रहे हैं आप किसी भी घर में छोटी टोपली सुपड़ी दिखाई नहीं देती। मध्य प्रदेश संस्कृति मंत्रालय इस संस्कृति को बचाने के लिए भी कोई कदम नहीं उठा रहा ऐसा ही सब कुछ चलता रहा तो यह कला एवं कलाकार लुप्त जाएंगे।




