सच कहें तो आजकल की जिंदगी भी किसी भूलभुलैया जैसी हो गई है—हर तरफ बस अंधी दौड़, तनाव और कभी न खत्म होने वाली उलझनें। मुझे अपने करियर और पढ़ाई का प्रेशर खाए जाता है, तो बड़ों को घर-परिवार और दुनियादारी संभालने की फिक्र रात-दिन दौड़ाती है। ऐसा लगता है मानो हर इंसान जिम्मेदारियों के किसी भारी जाल में उलझा हुआ है। लेकिन दिमाग के इसी गर्म इंजन को ठंडा करने के लिए कुदरत ने एक छोटा सा, जादुई ठहराव दिया है, जो कुछ पलों के लिए रूह को सुकून और थके हुए बदन को गजब की फुर्ती दे जाता है—और वो है, “एक कप गर्म चाय”।
चाय सिर्फ दूध, पत्ती और चीनी का घोल नहीं, बल्कि मुर्झाए हुए तन-मन में दोबारा जान फूंकने का एक मुकम्मल अहसास है। इस अहसास की सबसे खूबसूरत और जीवंत तस्वीर मुझे अपने घर में दिखती है। मेरे पिताजी किसान हैं; दिनभर खेतों में कड़कती धूप से जूझने और पसीना बहाने के बाद जब वह शाम को घर लौटते हैं, तो थकान उनके चेहरे की झुर्रियों में साफ नजर आती है। मगर, बरामदे की कुर्सी पर बैठते ही जब वह अपनी मीठी मालवी भाषा में आवाज लगाते हैं—”चाय बणाय लो रे…”—तो मानो जादू छा गया हो ! सच मानो तो पूरी थकान फुर्र हो जाती है। मालवी की उस मिठास में घुली चाय की वो पहली चुस्की, पिताजी के चेहरे पर जो सुकून और ताजगी लाती है, दुनिया की कोई महंगी दवा उसका मुकाबला नहीं कर सकती l
अपनों को सुकून देने वाली यही चाय, गाँव के खेतों में काम करने वाले मजदूरों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होती। दोपहर के ठीक तीन बजे, जब सूरज बिल्कुल सिर पर होता है, तब दूर से आती चाय की केतली को देखकर मजदूरों के मुरझाए चेहरों पर अचानक खिलखिलाती मुस्कान तैर जाती है। फिर किसी घने पेड़ की छांव में बैठकर, चाय की चुस्कियों के साथ होने वाली वो खट्टी-मीठी बातें उनके थके हुए हाथों में फिर से काम करने की नई जान फूंक देती हैं।
खेतों की इस छांव से निकलकर जब यह चाय शहर की सड़कों पर पहुंचती है, तो एक कमाल का सोशल नेटवर्क बन जाती है। सच कहूँ तो, चढ़ता दिन हो या ढलती सांझ, चाय हमेशा लोगों को अपनों से जोड़ने का सबसे आसान बहाना रही है। आज न जाने कितनी बड़ी-बड़ी योजनाएं, गंभीर चर्चाएं और दिल छू लेने वाले किस्से रोज चाय की टपरी पर जनम लेते हैं। यहाँ तक कि सुबह-सवेरे पूरी दुनिया की खबरें हमारे घरों तक पहुंचाने वाला अखबारवाला भी, खुद को तरोताजा करने के लिए सबसे पहले इसी चाय की दुकान पर आकर अपना डेरा जमाता है।
चाय की इसी टपरी पर सिर्फ खबरें नहीं छनतीं, बल्कि इंसानों के बीच मोहब्बत का रंग भी गहरा होता है। अक्सर शहरों में अपने घरों से दूर, अकेले रहने वाले युवाओं को जब जिंदगी में पहली दफा प्रेम का अहसास होता है, तो उनकी धड़कनों की पहली गवाही भी किसी नुक्कड़ की चाय दुकान ही
बनती है। डायरी के पन्नों पर कोई गहरा भाव उतारना हो, किसी खास से अपने दिल की बात कहनी हो, या बस दिनभर की थकान मिटाकर मुस्कुराना हो—लबों पर हमेशा एक ही सदा आती है: “चलो, दो घूंट चाय पर चलें…”।
देखा जाए तो यह चाय जिंदगी की तमाम उलझनों के बीच एक बेहद खूबसूरत और जरूरी विराम है। एक कप चाय की चुस्की हमारे भीतर के अकेलेपन को मिटाकर अपनापन घोलती है, और हमें हर हाल में मुस्कुराकर जीना सिखाती है।
लेखिका — रानु नागर