गुरु पूर्णिमा पर दुर्गा वाहिनी की बहनों ने किया संतों का सम्मान, पिपलेश्वर महादेव मंदिर में गुरुओं की चरणवंदना कर लिया आशीर्वाद
दिनभर चले हवन-पूजन, भजन-कीर्तन, गुरु पूजन एवं महाप्रसादी के आयोजन

सोनकच्छ। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व गुरुवार को कालीसिंध नदी के तट पर स्थित प्राचीन श्री पिपलेश्वर महादेव मंदिर, श्री 1008 ब्रह्मलीन बाबा महेश्वरानंद जी की तपोभूमि सहित पूरे सोनकच्छ क्षेत्र में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भक्तों ने अपने-अपने गुरुओं की चरण वंदना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। मंदिरों में हवन-पूजन, भजन-कीर्तन, धार्मिक अनुष्ठान एवं महाप्रसादी के आयोजन दिनभर चलते रहे।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विश्व हिंदू परिषद दुर्गा वाहिनी की बहनों ने श्री पिपलेश्वर महादेव मंदिर पहुंचकर महंत श्री लवचन्द्र दास जी उदासीन का स्वागत कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके पश्चात श्री खेड़ापति हनुमान मंदिर पहुंचकर श्री नवीन जी महाराज का सम्मान कर उनसे भी आशीर्वाद लिया। कार्यक्रम में प्रांत बाल संस्कार प्रमुख बबीता कौशल, अनीता, बुलबुल, ईशानी, चिंटू सहित दुर्गा वाहिनी की अनेक बहनें उपस्थित रहीं।
मंदिर परिसर को आकर्षक फूलों एवं झालरों से सजाया गया था। भगवान शिव का विशेष श्रृंगार कर विशेष आरती की गई। श्रद्धालुओं ने ब्रह्मलीन बाबा महेश्वरानंद जी की प्रतिमा पर तिलक कर शाल अर्पित की तथा श्रीचन्द्रजी महाराज की चरण वंदना की। महंत श्री लवचन्द्र दास जी उदासीन ने श्रद्धालुओं को गुरु पूर्णिमा के महत्व का संदेश देते हुए कहा कि गुरु ही जीवन का सच्चा पथप्रदर्शक होता है और गुरु की कृपा से ही ज्ञान, संस्कार एवं सद्बुद्धि प्राप्त होती है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान कर फल-प्रसाद वितरित किया।
गुरु पूर्णिमा को भैरव पूर्णिमा के रूप में भी श्रद्धापूर्वक मनाया गया। श्रद्धालुओं ने अपने कुल भैरव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर आकर्षक चोला अर्पित किया तथा दाल-बाटी-चूरमे का भोग लगाया। आषाढ़ मास की चतुर्थी से प्रारंभ होने वाला भैरव पूजन पूर्णिमा के दिन विधिवत संपन्न हुआ। घर-घर और गांव-गांव में कुल भैरव की पूजा-अर्चना की गई।
मंदिर परिसर में दिनभर भजन-कीर्तन, आरती, धार्मिक अनुष्ठान एवं महाप्रसादी का क्रम चलता रहा। देर शाम तक श्रद्धालुओं का मंदिर पहुंचने का सिलसिला जारी रहा और पूरे क्षेत्र में गुरु-भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास का वातावरण बना रहा।




