सोनकच्छ में जनता के पानी से खिलवाड़, इंजीनियर निलंबित।
पेयजल व्यवस्था में घोर लापरवाही, प्रशासन ने माना—हालात थे खतरनाक

सोनकच्छ | नगर में जनता को मिलने वाले पेयजल की गुणवत्ता के साथ गंभीर खिलवाड़ का मामला सामने आया है। पेयजल आपूर्ति एवं पेयजल यंत्रों के संधारण में घोर लापरवाही पाए जाने पर नगर परिषद सोनकच्छ में पदस्थ इंजीनियर जितेन्द्र मारू को प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।
संयुक्त संचालक, नगरीय प्रशासन एवं विकास, उज्जैन संभाग द्वारा 23 जनवरी 2026 को जारी आदेश के अनुसार नगर परिषद सोनकच्छ में किए गए निरीक्षण के दौरान पेयजल व्यवस्था की स्थिति अत्यंत चिंताजनक और खतरनाक पाई गई।
आदेश में दर्ज हैं गंभीर तथ्य
निरीक्षण में यह स्पष्ट हुआ कि नगर की ओवरहेड टंकियों की नियमित सफाई नहीं की जा रही थी, जबकि इसके लिए शासन द्वारा स्पष्ट निर्देश जारी किए गए हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार अमले ने लापरवाही बरती।
इतना ही नहीं, पेयजल को सुरक्षित बनाने के लिए आवश्यक ब्लिचिंग पाउडर का नियमानुसार उपयोग नहीं किया गया। जांच के दौरान पानी में क्लोरीन की मात्रा शून्य पाई गई, जो सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
WTP और फिल्टर प्लांट भी बदहाल
निरीक्षण के दौरान WTP एवं फिल्टर प्लांट की स्थिति भी अव्यवस्थित पाई गई। स्टार्टर और वायरिंग अस्त-व्यस्त हालत में थे, जिससे किसी भी समय बड़ी दुर्घटना की आशंका बनी हुई थी। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहे।
प्रशासन ने माना—शासन निर्देशों की अवहेलना
संयुक्त संचालक द्वारा जारी आदेश में साफ उल्लेख किया गया है कि पेयजल आपूर्ति एवं पेयजल यंत्रों के संधारण में उपयंत्री द्वारा घोर लापरवाही की गई तथा शासन के निर्देशों का पालन नहीं किया गया। इसी आधार पर इंजीनियर जितेन्द्र मारू को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है।
सबसे बड़ा सवाल
जब जांच में पानी में क्लोरीन शून्य पाई गई,
तब तक नगरवासी क्या पीते रहे?
बिना क्लोरीन का पानी = बीमारियों को न्योता
विशेषज्ञों के अनुसार बिना क्लोरीन का पानी हैजा, पीलिया, टायफाइड और दस्त जैसी बीमारियों का कारण बन सकता है। ऐसे में यह मामला केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि जनता की सेहत के साथ गंभीर खिलवाड़ का है।
निरीक्षण नहीं होता तो सच्चाई दब जाती
यह तथ्य भी सामने आया है कि यह लापरवाही किसी नियमित निगरानी से नहीं, बल्कि उच्च अधिकारियों के निरीक्षण के बाद उजागर हुई। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि—
क्या रोजाना की मॉनिटरिंग केवल कागजों तक सीमित थी?
क्या पहले की रिपोर्ट्स में “सब ठीक है” लिखकर वास्तविकता छुपाई जाती रही?
और यदि यह निरीक्षण नहीं होता, तो क्या यह लापरवाही यूं ही चलती रहती?
निलंबन को प्रशासन ने सख्त कदम बताया है, लेकिन अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या आगे जिम्मेदारी तय होगी, या फिर यह मामला सिर्फ एक अधिकारी तक सीमित रह जाएगा।




