इंदौर की फिक्र, सोनकच्छ पर मौन —ये कैसी दोहरी राजनीति?

सोनकच्छ। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई जनहानि के विरोध में कांग्रेस द्वारा प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का पुतला दहन कर इस्तीफे की मांग की गई। यह प्रदर्शन बस स्टैंड सोनकच्छ पर हुआ ।
विजयवर्गीय के पुतले दहन से नगर में राजनीतिक बहस को जरूर तेज किया, लेकिन इसी के साथ एक गंभीर सवाल भी खड़ा कर दिया—जब इंदौर के लिए इतना आक्रोश है, तो सोनकच्छ की कालीसिंध नदी में मिल रहे दूषित पानी पर चुप्पी क्यों?
कालीसिंध की दुर्दशा, जिम्मेदारों की चुप्पी
सोनकच्छ क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाने वाली कालीसिंध नदी में वर्षों से नालियों का गंदा पानी मिल रहा है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है और मीडिया इस मुद्दे को उजागर करता रहा है। इसके बावजूद न तो ठोस कार्रवाई हुई और न ही स्थायी समाधान।
सत्ता भी कांग्रेस की, सवाल भी कांग्रेस से
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि सोनकच्छ में जनपद पंचायत अध्यक्ष और नगर परिषद अध्यक्ष—दोनों कांग्रेस समर्थित हैं। ऐसे में जनता पूछ रही है—
जब स्थानीय सत्ता अपने ही दल के हाथ में है, तो कालीसिंध में गिरती नालियों पर रोक क्यों नहीं?
इंदौर में मौतें हों तभी संवेदनशीलता क्यों जागती है?
राजनीतिक शोर, जनस्वास्थ्य पर समझौता
इंदौर की घटना पर विरोध, पुतला दहन और बयानबाज़ी तो सुर्खियों में हैं, लेकिन सोनकच्छ में दूषित पानी का खतरा जनस्वास्थ्य से खुला खिलवाड़ बना हुआ है। विशेषज्ञ चेतावनी दे चुके हैं कि यदि यही हाल रहा, तो इंदौर के भागीरथपुरा जैसी त्रासदी से इनकार नहीं किया जा सकता।
अख़बारों में छपी खबरें और सड़कों पर प्रदर्शन तब तक अधूरे हैं, जब तक कालीसिंध की सफ़ाई और नालियों के डायवर्जन पर ज़मीनी कार्रवाई नहीं होती।
जनता अब नारों से नहीं, साफ पानी और जवाबदेही से न्याय चाहती है।
वरना आज इंदौर की राजनीति, कल सोनकच्छ का पछतावा—यही इस दोहरी राजनीति की असली कीमत होगी।




