प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना : बोर्ड चमकदार, सड़क बदहाल
सोनकच्छ। कागज़ों में विकास दौड़ रहा है, लेकिन जमीन पर सड़कें दम तोड़ रही हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का उद्देश्य गांवों को सुरक्षित और टिकाऊ सड़क सुविधा देना था, पर सोनकच्छ क्षेत्र में यह योजना अब केवल सूचना बोर्ड तक सिमटती नजर आ रही है। बोर्ड पर लाखों रुपये का संधारण दिखाया गया है, लेकिन सड़क पर गड्ढे ही गड्ढे हैं।
पांच साल का ठेका, पांच महीने जैसा काम
सोनकच्छ–जलेरिया 7.8 किलोमीटर मार्ग के लिए 7 जनवरी 2023 से 6 जनवरी 2028 तक संधारण का ठेका अंजली कंस्ट्रक्शन, इंदौर को दिया गया। पांच वर्षों में 21 लाख 9 हजार 220 रुपये का प्रावधान — गड्ढे भरने, दरार सुधार, शोल्डर दुरुस्ती, झाड़ियां काटने और पुल-पुलिया संधारण के नाम पर।
लेकिन हकीकत क्या है?
गड्ढे ऐसे कि दोपहिया चालक संतुलन खो दें
शोल्डर धंसे हुए
बारिश में जलभराव
सड़क किनारे झाड़ियां सड़क तक फैली हुई
यदि वर्ष में दो बार गड्ढे भरने का नियम है, तो सड़क पर स्थायी गड्ढों की मौजूदगी क्या संकेत देती है? क्या संधारण केवल फाइलों में पूरा हो रहा है?
इंजीनियरों की मौजूदगी या केवल हस्ताक्षर?
ग्रामीणों का आरोप है कि मरम्मत कार्य औपचारिकता बनकर रह गया है। कहीं आधा-अधूरा पैचवर्क, तो कहीं सिर्फ मिट्टी डालकर खानापूर्ति। नालियां जाम, पुल-पुलिया उपेक्षित और विभागीय निगरानी नाम मात्र की। सवाल उठता है — क्या विभागीय इंजीनियर मौके पर निरीक्षण करते हैं या सिर्फ कागज़ी प्रमाणों पर भुगतान होता है?
झाड़ियां बन रहीं जानलेवा जाल
वर्षा के बाद झाड़ियों की कटाई अनिवार्य है, पर कई मार्गों पर वर्षों से सफाई नहीं हुई। झाड़ियां इतनी बढ़ चुकी हैं कि सामने से आने वाला वाहन दिखता ही नहीं। गंधर्वपुरी रोड की माली घाटी पर झाड़ियों के कारण एक शिक्षक की जान जा चुकी है। क्या किसी की मौत के बाद भी तंत्र नहीं जागेगा?

ये सड़कें बनीं खतरे की राह
भोपाल रोड–पीपल्या बक्सू
पीडब्ल्यू कार्यालय–जलेरिया
पटाड़िया ताज–सुराखेड़ा कला
इन मार्गों पर रात में सफर करना जोखिम से खाली नहीं। छोटे वाहन चालक दहशत में चलते हैं।
जवाबदेही कौन तय करेगा?
ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारियों की उदासीनता के चलते ठेकेदारों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सड़कें यूं ही टूटती रहेंगी और जनता जोखिम उठाती रहेगी।
यदि संधारण के नाम पर लाखों रुपये स्वीकृत हैं, तो उसकी गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं? भौतिक सत्यापन सार्वजनिक क्यों नहीं? भुगतान से पहले सोशल ऑडिट क्यों नहीं?
वर्जन
“कुछ सड़कों की मरम्मत कराई गई है। जलेरिया रोड का टेंडर पूर्ण होते ही कार्य शुरू होगा। अन्य सड़कों का सुधार भी शीघ्र किया जाएगा।”
— जीवन गुप्ता
मुख्य महाप्रबंधक, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना
सवाल सीधा है — क्या योजना ग्रामीणों के लिए है या ठेकेदारों के लिए?
जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक बोर्ड चमकते रहें
गे और सड़कें टूटती रहेंगी।





