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कार्यक्रम में मटमैला और बदबूदार पानी पीती लाचार महिला—सम्मान के नाम पर अपमान।

सम्मान के मंच पर अपमान का घूंट, मीडिया के सवाल पर बदली व्यवस्था

सम्मान के मंच पर अपमान का घूंट, मीडिया के सवाल पर बदली व्यवस्था

केप्शन: कार्यक्रम में मटमैला और बदबूदार पानी पीती लाचार महिला—सम्मान के नाम पर अपमान।

शाजापुर। सरकारी योजनाओं में “लाड़ली” कहकर जिन महिलाओं को सम्मान देने की बातें की जाती हैं, उन्हीं लाड़ली बहनों को शाजापुर में अपमान का मटमैला पानी पीने पर मजबूर कर दिया गया।

जिला मुख्यालय स्थित उत्कृष्ट विद्यालय परिसर में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा आयोजित कार्यक्रम में महिलाओं के लिए नगर पालिका से मंगवाया गया बदबूदार और मटमैला पानी रखा गया, जबकि अधिकारियों और अतिथियों के लिए ब्रांडेड कंपनी का बोतलबंद पानी सजा हुआ था।

कार्यक्रम में पहुंचीं महिलाओं ने जब प्यास बुझाने के लिए पानी उठाया, तो उससे बदबू आ रही थी और रंग मटमैला था। कई महिलाओं ने पानी पीने से इनकार कर दिया, तो कई मजबूरी में वही पानी पीती नजर आईं।

यह दृश्य किसी भी संवेदनशील समाज को शर्मसार करने के लिए काफी था।

मीडिया न होता, तो क्या यही पानी पीती रहतीं बहनें?

मामला जब मीडिया के सामने आया, तब जाकर व्यवस्था हरकत में आई। महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों ने नगर पालिका को निर्देश दिए, जिसके बाद आनन-फानन में गंदे पानी के कैंपर हटाकर नए कैंपर मंगवाए गए।

यह सवाल अब प्रशासन से पूछा जा रहा है कि अगर पानी सही था, तो उसे बदला क्यों गया? और अगर गलत था, तो पहले क्यों परोसा गया?

दोहरा मापदंड: एक मंच, दो तरह का पानी

कार्यक्रम में मौजूद लोगों के अनुसार, अधिकारियों और अतिथियों के लिए ठंडा, साफ और बोतलबंद पानी उपलब्ध था, जबकि लाड़ली बहनों को समझौते वाला पानी दिया गया।

यह सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि मानसिकता की गंदगी को उजागर करता है—जहां मंच पर सम्मान की बातें और ज़मीन पर भेदभाव साफ दिखता है।

नगर पालिका का जवाब और सवालों की लिस्ट

 मीडिया के सवालों के बाद बदले गए पानी के कैंपर, देर से जागी व्यवस्था।

नगर पालिका जल शाखा प्रभारी ऋषि पारछे ने दावा किया कि नगर पालिका का पानी स्वच्छ है। उन्होंने मटमैलेपन का कारण फिटकरी बताया और कहा कि “थोड़ी देर में पानी साफ हो जाता है।”

लेकिन वे इस सवाल का जवाब नहीं दे सके कि

अगर पानी ठीक था, तो शिकायत के बाद वही कैंपर हटाकर नए क्यों लगाए गए?

यह सिर्फ पानी नहीं, गरिमा का सवाल है

यह घटना सिर्फ पानी की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। यह सम्मान, समानता और संवेदनशीलता का सवाल है।

जिन महिलाओं को योजनाओं के नाम पर मंचों पर बुलाया जाता है, उन्हें वहीं गंदा पानी देना व्यवस्था की असली सोच को उजागर करता है।

आज सवाल यह नहीं है कि

👉 कैंपर बदले गए या नहीं

सवाल यह है कि —

👉 क्या लाड़ली बहनों की इज्जत सिर्फ भाषणों और पोस्टरों तक सीमित है?

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